आरएसएस संगठन चरित्र निर्माण, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना को सेवा व अनुशासन से गढ़ता है। यहां दिखने से नहीं ढलने से पहचान बनती है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज कुछ अवसरवादी चेहरे भी संघ के नाम की ओट लेकर अपने निजी स्वार्थ साधने में जुटे हैं। जिनके भीतर संघ नहीं उतर सका। वे विंग्स के रास्ते प्रवेश लेकर खुद को संघ का प्रतिनिधि साबित करने में लगे हैं। संघ की विचारधारा नहीं उन्हें सिर्फ संघ की ताकत चाहिए। इन लोगों को संघ की मजबूती सेवा में नहीं बल्कि पुलिस, प्रशासन और नेताओं पर रौब दिखाने में नज़र आती है। जहां संघ का नाम हो वहां दबदबा जमाना और जहां सेवा चाहिए, वहां चुप्पी साध लेना यही इनका असली चरित्र है। संघ कभी सत्ता का शॉर्टकट नहीं रहा, लेकिन कुछ लोग उसे पहचान का पास बना लेना चाहते हैं। यह वही लोग हैं जो स्वयं को संघ से बड़ा और संघ को अपने हित से छोटा समझते हैं। अब समय है कि संघ के उच्च पदों पर आसीन निस्वार्थ सेवक
ऐसे नकाबपोशों पर पैनी दृष्टि रखें।
क्योंकि संघ कमजोर बाहरी आलोचकों से नहीं होता, अंदर घुसे स्वार्थियों से होता है। संघ साधना है सौदा नहीं। जो इसे साधना समझे वही स्वयंसेवक और जो इसे साधन समझे उस पर निगरानी अनिवार्य।
इंडिया की सोच बुलंद से सुनील सिंह की रिपोर्ट
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