भाजपा की ‘एकता यात्रा’ ने नेताओं को दिया कई किलोमीटर लंबा संकेत**
⏩ सुलतानपुर। ⏪
भाजपा ने जनपद में ‘एकता यात्रा’ निकालकर यह साफ कर दिया है कि अगर पिछली बार मिली हार ने किसी का दिल तोड़ा था, तो इस बार पार्टी ने उसे सिलने के लिए राजनीतिक सुई-धागा तैयार कर लिया है। इसौली विधानसभा का अलीगंज बाजार इस यात्रा का केंद्र बना—शायद इसलिए कि भीड़ भी मिले और संदेश भी।
यात्रा का पहला लक्ष्य था—“पिछली बार हारे थे… इस बार हार को हराएंगे”, और दूसरा लक्ष्य था—उन नेताओं को हल्का-फुल्का स्मरण कराना जो संगठन में ऊँचाई सिर्फ मंच पर ही पाना चाहते हैं, जमीन पर नहीं।
कुड़वार में तय सभा को अंतिम वक्त में अलीगंज शिफ्ट कर देना भी अपनी ही तरह का ‘सूक्ष्म किंतु तेज’ संदेश था—“जिसका क्षेत्र, वही सभा”—हमेशा जरूरी नहीं होता।
मंच पर उपमुख्यमंत्री ने जिन नेताओं के नाम लिए, वे मुस्कुरा उठे। जिनका नहीं लिया, वे भी मुस्कुराए—हालाँकि भीतर से मुस्कान का तापमान थोड़ा अलग था। पर असली आतिशबाज़ी तो तब हुई जब मंच पर मौजूद बहुदलीय यात्रा से होते हुए भगवा धारण कर चुके एक नेता को पाठक जी ने व्यंग्य की सौगात दे डाली।
बताया जाता है कि उन्हें मंच पर एक प्रतीक चिन्ह सौंपा गया। पाठक जी ने वही प्रतीक चिन्ह वापस करते हुए इतना ही
“इसे बेचकर किसी जरूरतमंद की मदद कर दीजिए।”
अब यह वाक्य किसी को सामाजिक संदेश लगा, किसी को राजनीतिक टिप्पणी… और कुछ लोग तो इसे ‘राजनीतिक वजन का मशीन-रीडिंग टेस्ट’ बता रहे हैं। मतलब—कितने भारी नेता वास्तव में कितने हल्के हैं, यह मंच पर ही नाप लिया गया।
राजनीतिक हलकों में चर्चा यह भी है कि यह संकेत है:
दल बदल का इतिहास बताकर कद नहीं बढ़ता—जमीन पर काम करके बढ़ता है।
पर यह बात जिन्होंने सुननी थी, उन्होंने सुनी या नहीं—यह अगली यात्रा बताएगी।
इन घटनाओं के बाद जिले में राजनीति का तापमान थोड़ा बढ़ गया है, और ‘एकता यात्रा’ अब ‘संकेत यात्रा’ के नाम से भी चर्चा में है। आने वाले दिनों में यह यात्रा और कौन-कौन से राजनीतिक इशारे बाँटती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं…।
इंडिया की सो बुलंद से सुल्तानपुर जिला रिपोर्टर सुनील सिंह की रिपोर्ट

0 Comments
Comments