धनबाद जिसे कभी कोयला नगरी की पहचान होने पर गर्व था आज दर्जनों आउटसोर्सिंग कंपनियों की मनमानी प्रशासनिक उदासीनता के कारण धूल प्रदूषण का गढ़ बनता जा रहा है खुलेआम चल रही कोयला खनन गतिविधियां बिना ढके ट्रकों की आवाजाही और पानी के छिड़काव जैसे बुनियादी व्यवस्थाओं की अनदेखी पूरे जिले की हवा को जहरीला बना दिया है स्थिति यह है कि सुबह होते ही सड़के बस्ती एवं कॉलोनी में धूल की मोटी परत जम जाती है इंसान को सांस तक लेना दुबर हो गया है बच्चे बुजुर्ग एवं महिलाओं सबसे ज्यादा प्रभावित है दमा एलर्जी खांसी आंखों में जलन और फेफड़ों की बीमारी आम हो चुकी है लेकिन जिम्मेदार कंपनियों और विभाग आंखें मूंदे बैठी है स्थानीय लोगों का आरोप है आउटसोर्सिंग कंपनियां मुनाफे के दौड़ में केवल लोगों के जान से खिलवाड़ करते हुए नियम कानून को ताक पर रखकर काम कर रही है ना तो पर्यावरणीय मानकों का पालन हो रहा है और ना ही प्रदूषण नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम उठाए जा रहे हैं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका भी सवालों के घेरे में है जो कागजी कार्रवाई तक सीमित नजर आती है धनबाद की हवा में जहर घुल रहा है और आम जनता घुट घुट के तिल तिल करने को मजबूर है सवाल यह है कि आखिर कब तक जनता इस प्रदूषण के कीमत अपनी सेहत से चूकती रहेगी क्या प्रशासन और सरकार जागेगी या धनबाद की जनता यूं ही धूल प्रदूषण में घुट घुट के करने को मरने कोई मजबूर रहेगी या धनबाद यूं ही धूल कण से दम तोड़ता रहेगा
झारखंड धनबाद इंडिया की सोच बुलंद प्रवीण सिंह की रिपोर्ट


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