चुनाव आयोग ने 23 साल के बाद एक बार फिर से वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान की शुरुआत की है. मौजूदा चक्र की शुरुआत बिहार से की गई थी और अब पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में भी SIR चल रहा है
मतदाता सूची का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) जारी है और इसी दौरान एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया है. 2002 से 2025 के बीच राज्य में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या में 66% की बढ़ोतरी हुई है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, 2002 में जहां कुल मतदाता 4.58 करोड़ थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 7.63 करोड़ हो गई है. सबसे अहम तथ्य यह है कि मतदाताओं की संख्या बढ़ने वाले शीर्ष 10 जिलों में से 9 जिले बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए हैं, जिसने राजनीतिक बहस को और तेज़ कर दिया है.
ईसीआई के आंकड़ों के अनुसार, जिन नौ सीमावर्ती जिलों में सबसे तेज़ वृद्धि देखी गई है, वे हैं: उत्तर दिनाजपुर (105.49% वृद्धि), मालदा (94.58%), मुर्शिदाबाद (87.65%), दक्षिण 24 परगना (83.30%), जलपाईगुड़ी (82.3%), कूच बिहार (76.52%), उत्तर 24 परगना (72.18%), नदिया (71.46%) और दक्षिण दिनाजपुर (70.94%). शीर्ष 10 में एकमात्र गैर-सीमावर्ती जिला बीरभूम (73.44%) है
SIR पर टीएमसी के विरोध और बीजेपी के लगातार पलटवार से साफ है कि बंगाल चुनाव में मुख्य मुद्दा घुसपैठियों का होने जा रहा है.
अब न्यायपालिका में भी हलचल है …आख़िर बदला क्या है?”
भारत की न्यायपालिका में वह बदलाव दिखाई देने लगा है, जिसके बारे में कुछ समय पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।जो न्यायमूर्ति कभी कहते थे कि “कॉलेजियम प्रणाली ही न्यायिक स्वतंत्रता की आत्मा है,” वही आज NJAC को पुनर्जीवित करने की मांग पर विचार करने की बात कर रहे हैं।
यह परिवर्तन केवल एक विचार नहीं है, बल्कि एक संकेत है कि प्रणाली के भीतर दबाव बढ़ा है और बाहर की आवाज़ें अब अनसुनी नहीं रह गई हैं।
CJI सूर्यकांत का यह कहना कि “हम देखेंगे,” एक साधारण प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह स्वीकारोक्ति है कि कॉलेजियम को लेकर उठ रहे राष्ट्रीय प्रश्नों को अब और टाला नहीं जा सकता।
जब एडवोकेट मैथ्यूज़ नेडुमपरा ने कोर्ट में यह तर्क रखा कि पहली पीठों ने NJAC के अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया था, तब अदालत की प्रतिक्रिया असामान्य रूप से सकारात्मक थी।
यह वही विषय है, जिसे न्यायपालिका वर्षों से “स्पर्श मत करो” वाली नीति के तहत सुरक्षित रखती थी।
लेकिन अब हवा बदल चुकी है।अब अदालतें भी महसूस कर रही हैं कि ‘Above God’ वाली छवि जनसमर्थन से नहीं, बल्कि विवादों से पैदा हुई है।अब न्यायपालिका को अपने बंद कमरों के निर्णयों की पुनः समीक्षा करनी पड़ेगी।
सवाल यह है कि यह परिवर्तन स्वतः आया है, या सोशल मीडिया और जनता के दबाव ने इसे मजबूरन जन्म दिया है?
आज लाखों लोग खुलेआम पूछ रहे हैं कि न्यायपालिका में नियुक्ति का अधिकार कुछ व्यक्तियों तक सीमित क्यों है।लोग यह जानना चाहते हैं कि NJAC जैसे लोकतांत्रिक मॉडल को केवल इसलिए क्यों खारिज कर दिया गया क्योंकि उसने पारदर्शिता की मांग की थी।
कई वर्षों तक न्यायपालिका ने इन सवालों को “लेसन मत दो” वाले रवैये से टाल दिया।लेकिन अब परिस्थितियाँ उसी न्यायपालिका को अपने पुराने निर्णयों के पुनर्मूल्यांकन के लिए बाध्य कर रही हैं।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जब न्यायपालिका स्वयं अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हो जाए, तब यह संकेत केवल एक कानूनी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि एक नई संवैधानिक संस्कृति का होता है।
अगर NJAC पर पुनः विचार शुरू हुआ, तो यह भारत की न्याय व्यवस्था के इतिहास में सबसे बड़ा सुधार होगा।और यह भी सच है कि यह सुधार केवल न्यायालयों में नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ में पैदा हुआ है।
आज न्यायपालिका जिस दबाव को महसूस कर रही है, वह अदालत की दीवारों के भीतर जन्मा नहीं है।यह वह दबाव है जो देश की जनता, सोशल मीडिया और पारदर्शिता की बढ़ती माँग ने मिलकर बनाया है।
और शायद यही वह कारण है कि वर्षों तक “स्पर्श मत करो” का विषय अब अदालत के दरवाज़े पर दस्तक दे चुका है।अब न्यायपालिका को भी यह स्वीकार करना होगा कि देश लोकतंत्र से चलता है, और लोकतंत्र में जनता की आवाज़ एक दिन सबको सुननी पड़ती है।
यह सिर्फ शुरुआत है।आगे जो आएगा, वह भारत की न्यायिक संरचना को हमेशा के लिए बदल सकता है।
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