भोपाल / नर्सिंहपुर, मध्य प्रदेश, 19 नवंबर 2025 —
मध्य प्रदेश पुलिस की एलीट हॉक-फोर्स यूनिट के इंस्पेक्टर आशीष शर्मा नक्सलियों के साथ भारी-multi-state मुठभेड़ में शहीद हो गए हैं। यह घटना MP-छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र की तिजोरी-जंक्शन के घने जंगलों में हुई एक संयुक्त ऑपरेशन के दौरान हुई।
मुठभेड़ का विवरण और शहादत
ऑपरेशन सुबह लगभग 8:30 बजे शुरू हुआ, जब हॉक-फोर्स की टीम को गहन खुफिया जानकारी मिली थी कि वहाँ नक्सलियों का बड़ा ग्रुप मौजूद है।
शर्मा कमांड में सबसे आगे थे। गोलीबारी की शुरुआत नक्सलियों की ओर से हुई, लेकिन उन्होंने अपनी टीम का नेतृत्व जारी रखा और जवाबी कार्रवाई की।
उन्हें कंधे, पेट, जांघ और हाथ में गोलियाँ लगीं।
घायल अवस्था में उन्हें डोंगरगढ़ (रायनांदगांव जिला, छत्तीसगढ़) के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर ले जाया गया, और एयर-एम्बुलेंस की व्यवस्था भी की गई, लेकिन वे ज़्यादा रक्तस्राव के कारण बचाये नहीं जा सके।
उनका जीवन और बहादुरी
आशीष शर्मा मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के बोहानी गांव के रहने वाले थे।
वे हॉक-फोर्स में बहुत ही सक्रिय और बहादुर अफसर माने जाते थे।
उन्हें दो वीरता पदक (गैलन्ट्री मेडल) मिल चुके थे, जो उनकी बहादुरी और प्रतिबद्धता की ओर संकेत करते हैं।
फरवरी 2025 में उनकी टीम ने बालाघाट के रौंदा जंगल में 4 नक्सलियों को मार गिराया था — एक ऑपरेशन जिसे पुलिस की स्क्रीनिंग और प्रशिक्षण में मॉडल केस के रूप में पढ़ाया जाता रहा है।
डीएसपी (स्टाफ अफसर) संतोष पटेल ने बताया कि शर्मा अक्सर पांच-पांच दिन तक जंगलों में रहकर टीम का नेतृत्व करते थे, बिना भोजन और पूरी सावधानी के।
उनकी शादी जनवरी 2026 में तय थी।
राज्य और पुलिस का सम्मान
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने उनकी शहादत पर गहरा शोक व्यक्त किया और उन्हें “अविस्मरणीय बलिदान” बताया।
उनकी बहुमूल्य शहादत को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार मिला।
परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवज़ा (ex-gratia) घोषित किया गया है, और उनकी छोटी भाई को सब-इन्स्पेक्टर (जांच अधिकारी) पद देने की घोषणा की गई है।
उनके सम्मान में उनके गाँव में पार्क और स्टेडियम बनाने की योजना बनाई गई है।
सहकर्मियों और वरिष्ठों के अनुसार, शर्मा की बहादुरी सिर्फ एक ऑपरेशन तक सीमित न थी — उनकी माने जाने वाली रणनीति और इनोवेटिव पॉलिसिंग शैली आज भी नए अफसरों को प्रशिक्षण में सिखाई जाती है।
उनकी टीम ऑपरेशनों में हमेशा आगे रहने की कहानी बन गई है — उन्होंने नक्सलियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में न सिर्फ़ मार गिराने का योगदान दिया, बल्कि सुरक्षा बलों की छाप को मजबूत किया।
उनकी अगली शादी की तैयारी थी, लेकिन उनकी शहादत ने पूरा परिवार, उनके सहकर्मियों और देश को गहरा झटका दिया।
निरीक्षक आशीष शर्मा ने अपनी जान की परवाह किए बिना, नक्सलियों के खिलाफ मोर्चे पर खड़े रहकर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी शहादत सिर्फ एक पुलिस ऑपरेशन नहीं थी — यह देश, कानून और न्याय की उस लड़ाई का प्रतीक है, जिसे वे पूरी निष्ठा और बहादुरी से लड़ते रहे। उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि समाज में सुरक्षा और शांति की कीमत अक्सर उन बहादुरों की जान के रूप में चुकाई जाती है।
इंडिया की सोच बुलंद से सुल्तानपुर जिला रिपोर्टर सुनील सिंह की रिपोर्ट

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