सियालकोट: वोट की कीमत और बंटवारे की दर्दनाक कहानी

वोट की कीमत 

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पाकिस्तान के पंजाब में एक बड़ा शहर है- "सियालकोट". ये लाहौर से 135 किलोमीटर दूर है और जम्मू से उसकी दूरी मात्र 42 किलोमीटर है. अखंड भारत में यह हिंदू बहुल क्षेत्र था.

1941 की जनगणना के अनुसार सियालकोट में हिंदू  सिक्ख की संयुक्त आबादी 2 लाख 31 हजार थी. यहां के हिंदू बहुत ज्यादा सेकुलर थे और मुस्लिम्स के साथ बहुत भाईचारा रखते थे.

जब देश की आजादी और बंटवारे की बात चल रही थी तो पंजाब के हिंदू नेता चाहते थे कि सियालकोट भारत में रहे. इसको लेकर कई बैठकें हुईं और अंत में जनमत संग्रह कराने का फैसला लिया गया.

जनमत संग्रह का दिन निश्चित हो गया. वोट कैसे डाले जायेंगे ये भी तय हो गया और निर्धारित दिन पर वोटिंग भी हो गई. वोटिंग का निर्णय 55000 वोट के अंतर से पाकिस्तान के पक्ष में गया. 

बहुमत से तय हो गया कि सियालकोट पाकिस्तान का हिस्सा होगा. इसका मुख्य कारण था कि लगभग एक लाख हिंदूओ ने वोट  नहीं दिया था, जबकि शायद ही कोई ऐसा मुस्लिम था जिसने वोट न डाला हो.

16 अगस्त 1946 को मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन डे का आह्वाहन किया. डायरेक्ट एक्सन और बंटवारे के दंगे में हिंदुओं और सिक्खों का सबसे ज्यादा कत्लेआम सियालकोट में ही हुआ.

जिन हिंदूओ / सिक्खों ने जनमत संग्रह मे वोट डालने की बजाय घर में रहकर आराम करने की सोची, वे हमेशा के लिए आराम ही करते रह गये. उनकी औरते और बच्चे भी राक्षसों की बहसत का शिकार हुए. 

हजारों लोग मारे गए, हजारों लोगों को अपना घरबार छोड़कर भागना पड़ा, हजारों महिलाओं का बलात्कार हुआ, हजारों लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्म परिवर्तन किया गया.

वोटिंग के दिन, वोट देने की बजाय छुट्टी मनाने की, बहुत बडी कीमत हिंदूओ ने सियालकोट मे चुकाई. इसका प्रमाण हमारे सामने है पर हम अब भी इससे सबक नहीं ले रहे हैं.

मुंशी प्रेमचंद जैसे सेकुलर लेखक भी सियालकोट के कत्लेआम की घटना से इतने आहत हुए थे कि उन्होंने सियालकोट कत्लेआम की पृष्ठभूमि वाली "जेहाद" कहानी लिखी थी.

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