दीपों की रोशनी में मिली उम्मीद: जब दो नन्ही परियों का सहारा बने 'खाकी वर्दी' वाले फ़रिश्ते


कायमगंज (फर्रुखाबाद):

कायमगंज के लोहाई बाज़ार में, जहाँ दीपावली के आगमन की चहल-पहल थी, वहीं दो मासूम आँखों में ग़म और संघर्ष का अँधेरा पसरा था। पिता के असमय चले जाने से परिवार की आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी, और यही कारण था कि कक्षा 8 की अनुष्का और कक्षा 6 की प्रियल, ये दो नन्ही बहनें, अपने छोटे भाई आरव और बीमार माँ के लिए सहारा बनने को मजबूर थीं।

पिछले तीन दिनों से ये फूल-सी बच्चियाँ, दीपावली पर परिवार की छोटी-मोटी ज़रूरतों को पूरा करने की उम्मीद में, अपने हाथ से बने मिट्टी के दीए बेच रही थीं। हर दीया इनके संघर्ष और बेबसी की कहानी कह रहा था।

लेकिन रविवार की शाम, गश्त के दौरान, जब कोतवाली प्रभारी मोहम्मद कामिल की नज़र इन बच्चियों पर पड़ी, तो उनकी वर्दी में छिपा इंसान जाग उठा। बच्चियों के चेहरे की उदासी और उनके संघर्ष की दास्तान सुनकर उनका हृदय पसीज गया।

मोहम्मद कामिल ने बिना देर किए, सिर्फ़ उनकी मदद करने का दिखावा नहीं किया—उन्होंने उन सभी दीयों को खरीद लिया, जो बच्चियाँ आशा की आख़िरी किरण मानकर बेच रही थीं।

इतना ही

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